वे आतंकवादी न थे
नित अपनी पीठ पर
अपनी दूकान को लादे
वह गाँव से शहर आता है
हो तेज़ धूप
या बरखा की फुहार हो
विरासत में मिला
उसकी उम्र से बडा
राहत कुछ तो देता है
उसका जो छाता है।
पत्नी की बीमारी
बेटे की शिक्षा
पल पल बढती
मुनिया की शादी की चिंता
या फिर आज शाम का राशन
सब चिंताओं को
मस्तिष्क में समेटे
चमरे की कतरनों के बीच
घिरा बैठा वह बूढा मोची
ज़र्ज़र हुए तन की
शेष बची ताकत को
एक जूते को
चमकाने में लगाता है
और चमकते जूते को देख
सोचता है
इस एक जोडी जूते के दाम
मेरी दूकान की कीमत से जयादा है
क्या हो रहा है इस शहर में
कौन नेता है कौन अधिकारी
किसने किसको लूटा
की किसने, किससे नोचा खोची
इन सब से बेखबर
अपने काम में मग्न
वह बूढा मोची।
उस समय रह गया हतप्रभ
जब उसकी दूकान (पेटी) को
किसी ने सड़क आईआर फ़ेंक दिया
वे आतंकवादी न थे
थे वो अतिकर्मन के दुश्मन
महापालिका के कारिंदे।
अपने अरमानो का ज़नाज़ा
अपनी आँखों से
होगा देखना शायद
इसकी उसे कल्पना भी न थी।
पुनः अरमानो को अपने
संजोने के लिए
अपनी दुनिया फिर से सजाने के लिए
एक एक कतरन को
बीन रहा था वो मोची।
वो सोच रहा था
उसकी आँखों में आंसू
भरे हुए थे
एक आह खींच कर देखा उसने
महलों वाले
सडकों तक बढे हुए थे
हाटी शब्द की उत्पत्ति के बारे में कहा जाता है कि अपनी आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी के लिए, पहले यहां के लोग (पूरे पूरे गांव के लोग)वर्ष में एक या दो बार, किसी हाट (बाजार) में समूह बनाकर जाते थे। समूह के रूप में जाने के कारण धीरे धीरे ये हाटी नाम से प्रसिद्ध हो गए। मूलत: यह कनैत ही हैं। जौनसार बावर के लोगों से इनका रोटी बेटी का संबंध है। तीन साल से अधिक समय तक मैंने इनके क्षेत्र का भ्रमण किया तथा गहन अध्यन करने के बाद हिमाचल गिरिपार का हाटी समुदाय नाम से एक पुस्तक लिखी।
Saturday, January 16, 2010
हिमांचल का एक ऐसा समुदाय है जो जनजाति की विशेषताएं
रखते हुए भी जनजाति के रूप में स्वीकार नहीं हो पाया।
जबकि यह उतरांचल के जोंसार बाबर समुदाय से सम्बंधित हैं । उनसे इनके रोटी बेटी के सम्बन्ध हैं ।
मैंने जनुअरी २०१० के दूसरे सप्ताह में वहां एक सप्ताह शर्ली गाँव में निवास किया । मैंने वहां इस समुदाय की पीरा का बहुत गहराई से अध्यन किया ।
सबसे पहले तो मैंने यह निर्णय लिया की मैं इन्हें अपना मानकर एक किताब के माध्यम से इनके दर्द को दुनिया के सामने लाऊँ ।
दूसरा यह कि अपने बचे हुए कार्यों को जल्दी निपटा कर मैं अपना शेष जीवन
इस समुदाय के उत्थान में व्यतीत कर दूंगा ।
ईश्वर मुझे इस काम को करने कि शक्ति तथा इस समुदाय का प्रेम दे ।
पवन बख्शी
रखते हुए भी जनजाति के रूप में स्वीकार नहीं हो पाया।
जबकि यह उतरांचल के जोंसार बाबर समुदाय से सम्बंधित हैं । उनसे इनके रोटी बेटी के सम्बन्ध हैं ।
मैंने जनुअरी २०१० के दूसरे सप्ताह में वहां एक सप्ताह शर्ली गाँव में निवास किया । मैंने वहां इस समुदाय की पीरा का बहुत गहराई से अध्यन किया ।
सबसे पहले तो मैंने यह निर्णय लिया की मैं इन्हें अपना मानकर एक किताब के माध्यम से इनके दर्द को दुनिया के सामने लाऊँ ।
दूसरा यह कि अपने बचे हुए कार्यों को जल्दी निपटा कर मैं अपना शेष जीवन
इस समुदाय के उत्थान में व्यतीत कर दूंगा ।
ईश्वर मुझे इस काम को करने कि शक्ति तथा इस समुदाय का प्रेम दे ।
पवन बख्शी
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